Friday, 15 February 2008
तृप्ति
Mathew 6.7
माँगो और तुम्हे मिलेगा, ढूँढो और तुम पा सकोगे,खटखटाओ और द्वार खुल जायेगा।
इस वाक्य में जीवन का एक अहम सत्य छिपा हुआ है।
कितनी चाहते हैं। कितनी इच्छायें। कितने अधिकार। कई बार इन सब में और हम में सिर्फ एक माँग की दूरी होती है।
सत्य, सिद्धान्त,प्यार,निदान,शान्ति.....ईश्वर....क्या नहीं मिलता अगर ढूँढने का धैर्य हो ।
जिन्दगी के बन्द दरवाज़े कई बार सिर्फ एक दस्तक से खुल जाते हैं।
निष्क्रियता के परिणाम अक्सर अतृप्त करते हैं।
अक्सर जिन्दगी से अगर पूरे विश्वास से कुछ माँग लो तो वह मिल जाती है।
माँगने में सबसे बड़ी दुविधा ही यही होती है कि अक्सर हमें यही मालूम नहीं होता की हम चाहते क्या हैं।
शायद कुछ भी पाने के लिये पहले अन्तरदृष्टि होना आवश्यक है और माँग तय करना जरूरी है।
फिर....
माँगो और तुम्हे मिलेगा, ढूँढो और तुम पा सकोगे,खटखटाओ और द्वार खुल जायेगा।
Friday, 1 February 2008
क्या हैं हमारी मौलिक जरूरत?
हम अलग हैं। इसी भिन्नता में हमारी पहचान है,अस्तित्व है। पर इस अस्तित्व तक पहुँचाने के लिये कुछ मूल इंसानी जरूरते जवाबदेह हैं। यही लगातार हमें हम बनाती हैं। इन जरूरतों को पूरा करने की कोशिश में हम अपना व्यवहार, अपने सिद्धान्त,अपने जीवन मूल्य और अपने जीवन की दिशा तय करते हैं।
इन मूलभूत जरूरतों को इस तरह रेखांकित किया गया है-
1.नैश्चित्य- सुरक्षित,सकुशल और सुखी रहने की जरूरत
2.विविधता- विविध अनुभवों और अनिश्चय की जरूरत
3.महत्व-महत्वपूर्ण, प्रतिष्ठित और अर्थपूर्ण अस्तित्व की चाह
4.लगाव/स्नेह- किसी दूसरे से निकटता महसूस करने की जरूरत
5.विकास- नई बाते स्वयं के विकास के लिये सीखने की आकांक्षा
6.योगदान-किसी और को अंशदान देने की जरूरत
हमारे जिन्दगी के अहम चुनाव पहली जरूरत के हिसाब से किये जाते हैं। पढ़ाई लिखाई, नौकरी, शादी के लिये उपयुक्त वर,बैंक में पूँजी, इनश्योरेन्स वगैरह। हम सुरक्षित महसूस करने की चाह में इन चुनावों को अंजाम देते हैं। कई बार कोशिश करने पर भी ऐसा नैश्चित्य संभव नहीं होता। पर जरूरत तो बनी रहती है।
ऐसे में कई बार उदासी और विषाद का चुनाव किया जाता है। उदासी एक निश्चित अहसास है। अगर हम किसी और चीज़ की अपेक्षा ना करें और खुद के प्रति उदासीन रहें तो हम निश्चित कर सकते हैं कि हम इस जाने पहचाने अहसास में खुद को कैद कर सकते हैं।
कई बार हमें जो बातें सुरक्षा देती हैं उन्ही से ऊब होने लगती है। सब कुछ अगर एक समान ही रहे....हर रोज़ में जब अंतर महसूस ना हो तो यह निश्चित्तता से ही घबराहट होने लगती है।, एक तरह का खानपान,रोज़ वही दिनचर्या नौकरी में रोज़ एक सा काम,वही दोस्त....।
इस ऊब में अक्सर एक घुटन होती है। और तब जरूरत महसूस होती है विविधता की। जीवन में भले ही दिन, रात होते होते ढ़ल जाये .....आसमान का रोज़ थोड़ा अलग दिखना जरूरी है। रोज़ कुछ अलग करना, रास्ते थोड़ा बदलना, नौकरी में कुछ चुनौती पाना....खुद की सीमाओं को लाँघना।
ऐसे ही कुछ प्रयासों से इंसान भीड़ से खुद को अलग करता है। खुद का महत्व साबित करने में सक्षम होता है। प्रतिष्ठा हासिल करता है। एक ऐसा व्यक्तित्व बनता है जिसका समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान बनता है। यह प्रतिष्ठा भी एक बहुत अहम जरूरत है।
एक मनुष्य का दूसरे के साथ लगाव और रिश्ता हमारी बुनियादी जरूरत है। प्यार एक जरूरत है।करना भी और पाना भी। हम किसी दूसरे के साथ एक नाता,जुड़ाव महसूस करना चाहते हैं। हमारा परिवार, प्रियतम, सहकर्मी, दोस्त ....सभी की अहम भूमिका है हमारे जीवन में। इस जुड़ाव के बिना एक अजीब सी रिक्तता महसूस होती है। ऐसे में व्यक्तित्व मुरझाने लगता है।
जब हमारी यह पहली चार जरूरतें पूर्ण हों तो हमें आगे बढ़ने की चाह होती है। नया सीखना, नया देखना और नया महसूस करना। जीवन के रहस्यों को सुलझाना। विकास एक प्रक्रिया है जिससे हम ऐसे में बँधना चाहते हैं। रोज़ ज्ञान की वृद्धी होना भी एक जरूरत है जिसे हम नकार नहीं सकते।
जब ऐसा कर पाना सँभव नहीं हो पाता हम हताश हो जाते हैं।
जीवन के पाँचों जरूरतो को पूरा कर पाने में सक्षम होने पर हम अपना योगदान समाज को देना चाहते हैं। किसी के एकांत में साथ, किसी की निश्चित्तता की जरूरत को पूरा करना, अपने अनुभव से दूसरों को सिखाना, विषाद से दूसरों को निकालना, विकास के रास्ते बनाना....तुच्छ को महत्व देना, जीवन में अनुराग के स्रोत खोल देना.....
जाहिर है हर इंसान इन सभी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता। पहले वाली जरूरतों से जूझ इतना थक जाता है कि कभी बाद वाली तक पहुँच नहीं पाता।
इन जरूरतों को समझना एक आवश्यक ज्ञान है। इससे हमें हमारे व्यवहार के पीछे के कारण ज्ञात होते हैं। और तब ही हम नकारात्मक व्यवहार बदल कर कुछ सकारात्मक हासिल कर सकते हैं। अगर जरूरत ज्ञात हो तो उसे पूरे करने के साधन ढूँढे जा सकते हैं। इन जरूरतों को सही तरह पूरा किया जा सकता है।
.......और फिर शायद हम वह व्यक्तित्व हासिल कर सकते हैं जिसका खाका परम ने तैयार कर के हमें इस संसार में भेजा था।
( इन जरूरतों को मैने रेखांकित नहीं किया है। पढ़ा था। असली संदर्भ याद नहीं। इसपर ध्यान दिलाने और आप सब तक पहुँचाने जितना ही श्रेय मेरा है।)
Tuesday, 29 January 2008
सब कुछ अच्छा है All Things Are good
पवित्र बाईबिल का एक कथन है "ईश्वर ने अपनी सृष्टि पर दृष्टि डाली और देखा कि सब कुछ अच्छा है". इसका मतलब यह हुआ कि यदि मैं आप यदि इस मानवजीवन को अच्छा नहीं पाते हैं तो हमें अपने कर्मों को या नजरिये को जांचना होगा.
[Photograph, NASA]
In the Holy Bible it is said that God looked at the creation and found that "all was good". The statement does not amaze any child of God who walks in tune with the Divine.
As soon as the human child opens his eyes, he is so much subject to human desires, emotions, and ambitions that he tends to give priority to those things, rather than to relation with God. This in turn changes his outlook.
Instead of a God-centric viewpoint, he develops a man-centric outlook. The moment this happens, his perception is distorted. What is good looks bad to him, and what is evil looks good to him.
We need to align our will and desire with that of the Divine. Then only will we be able to perceive what things are good and why they are so.
Shastri JC Philip, the author, is a Senior Marriage & Family counselor trained in India and abroad. His main website is Sarathi, in the Hindi language.




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